अपराजेय योद्धा महाराणा प्रताप
9 मई जन्मतिथि पर विशेष
महाराणा प्रताप पूरे विश्व के अगणित देशभक्त योद्धाओं में उन विरले योद्धाओं में से एक हैं, जिन्होंने दुनिया के तमाम सुख-सम्पदा, ऐश्वर्य, वैभव को तिलांजलि देते हुए स्वयं से कई गुणा धन, सैन्य बल,शस्त्र बल और विशाल साम्राज्य के शासक की अधीनता स्वीकार न कर, अपने देश और स्वयं की स्वतंत्रता के लिए अनेकानेक अभावों के रहते उससे युद्ध करना श्रेयस्कर समझा।
महाराणा प्रताप वीर, धीर, महावीर, पराक्रमी, अदम्य साहसी, शौर्यवान, स्वाभिमानी, बलशाली, अपराजेय योद्धा, विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने में प्रवीण, विशिष्ट रणनीतिकार, युद्धकला में परांगत योद्धा ही नहीं थे,बल्कि कुशल, न्यायप्रिय, प्रजावत्सल्य शासक,स्थापत्य कला, कला,साहित्य प्रेमी भी थे। महाराणा प्रताप ने कभी भी मुगल सम्राट अकबर के सामने सिर नहीं झुकाया। उनकी जीवन सादगी, साहस और देशप्रेम की सर्वोच्च मिसाल है। ये मेवाड़ के सिसौदिया वंश के तेरहवें राजपूत शासक थे, जो वीरता, स्वाभिमान और मुगल सम्राट अकबर के खिलाफ संघर्ष के प्रसिद्ध हैं। हल्दी घाटी के युद्ध में अदम्य साहस दिखाने वाले प्रताप ने आधी उम्र जंगलों में बिताकर भी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका प्रिय घोड़ा ‘चेतक’ और वे स्वयं अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के प्रतीक हैं।उनके विषय में देश के साहित्यकारों, कवियों, चरण-भाटों ने जितना लिखा है,शायद ही किसी दूसरे भारतीय देशभक्त योद्धा के बारे में लिखा गया हो। वे अपने देशभक्तों की सबसे बड़े प्रेरणा रहे हैं और आगे भी बने रहेंगे।
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 और भारतीय पंचाग के अनुसार जेष्ठ सुदी/शुक्ल तीज,रविवार, सम्वत् 1597 को राजस्थान के मेवाड़ के सिसौदिया वंश में कुम्भलगढ़ में हुआ। उनके पिता राणा उदय सिंह द्वितीय और उनकी माता जयन्ता बाई थीं। उन्हंे बचपन में भील समुदाय के लोग प्यार से ‘कीका’ कह कर पुकारते थे। उनका राज्याभिषेक 28 फरवरी, 1572 को गोगुन्दा में हुआ। जब महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ,तब राजकोष की स्थिति और राज्य की आन्तरिक सुरक्षा की स्थिति सही नहीं थी। ऐसी विषम स्थिति में उनके लिए मुगल सेना से युद्ध करना सम्भव नहीं था। उन्होंने प्रशासनिक सुधार के साथ-साथ उदयपुर की सुरक्षा व्यवस्था के कड़े प्रबन्ध किये। इसके लिए उन्होंने उदयपुर के निकटस्थ बस्तियों से लेकर नगर तक की सुरक्षा व्यवस्था के लिए चौकियाँ स्थापित कीं, जहाँ हर मार्ग पर आने-जाने वालों पर गहन दृष्टि तथा उनसे कड़ी पूछताछ की जाती थी। आम लोगों के रात्रि आवागमन पर रोक लगा दी गई। नए सैनिकों की भर्ती और उनके प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की गई। मेवाड़ की सुरक्षा के लिए एक तीरन्दाजों का नवीन संगठन बनाया गया,जो धनुष बाण के साथ-साथ गुलेल का प्रयोग करते थे। महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के स्वतंत्रता के लिए जो प्रतिज्ञा की थी,उसके प्रभाव से सामन्तों और सजातीय सरदारों ने स्वयं को महाराणा प्रताप को समर्पित कर दिया। महाराणा प्रताप गुप्तचर/भेदिया व्यवस्था के महत्त्व को समझते थे इसके अभाव में युद्ध में सफलता आसान नहीं होती।इसलिए उन्होंने मुगलों की तरह दूतों के साथ-साथ शत्रुओं की गतिविधियों और सैन्य शक्ति आदि की जानकारी हेतु अपनी भेदिया/गुप्तचर व्यवस्था को सुदृढ़ किया। इसके साथ ही प्रधानमंत्री रामा महासाणी की संदिग्ध गतिविधियाँ देखते हुए उन्हें पदच्युत कर उनके स्थान पर भामाशाह को प्रधानमंत्री बनाया, जो पहले से ही वित्तमंत्री तथा सेनापति थे। अकबर के मेवाड़ पर जीत की प्रबल आकांक्षा/चाहत के पीछे कई कारण थे इनमें पहला कारण भारत का चक्रवर्ती सम्राट बनना,जिसमें मेवाड़ बाधक बना हुआ था। दूसरी वजह व्यापारिक थी,क्योंकि उसम विदेशी व्यापार गुजरात के सूरत बन्दरगाह से होता था, इसके लिए माल मालवा के मार्ग से जाता-आता था, यह मेवाड़ के कारण असुरक्षित था। तीसरा बड़ा कारण धार्मिक था, क्योंकि उसके राज्य के मुसलमान हज के लिए मक्का,मदीना सूरत बन्दरगाह से जलयान से जाते थे ,यद्यपि हिन्दू विशेष रूप से राजपूत उन्हें किसी प्रकार से परेशान नहीं करते थे,तथापि अकबर को उनके साथ किसी भी अनहोनी का सदैव भय बना रहता था। अन्तिम चौथा कारण अकबर की मेवाड़ पर अधिकार नहीं कर पाने की थी,क्यों कि उसके दादा बाबर भी सन् 1526 के ‘खानवा युद्ध’ में सफल होने पर मेवाड़ पर अधिकार नहीं कर पाना था। फिर अकबर को भी चित्तौड़ युद्ध में बहुत गवांने के पश्चात् भी उसे चित्तौड़ दुर्ग से खाली हाथ लौटना पड़ा था। इसलिए वह हर हाल में मेवाड़ जीतना चाहता था। लेकिन वह जानता था कि भले ही राजपूताने के अनेक राजपूत राजाओं ने विभिन्न कारणों से उससे मैत्री सन्धि कर ली है,पर उनके हृदय में मेवाड़ नरेश के लिए विशेष सम्मान बना हुआ है, इसलिए उसके लिए मेवाड़ के विरुद्ध कठोर कदम उठाना सहज नहीं था,क्योंकि इससे अकबर को राजपूतों केे रुष्ट/कुपित होने का डर था। इस कारण अकबर मेवाड़ के महाराणा प्रताप के प्रति उदार शर्तों पर,बिना रक्तपात के उनसे समझौता करना चाहता था। वह चाहता था कि महाराणा प्रताप उससे शान्ति से सुलह कर लें और उनका सम्मान भी यथा सम्भव अक्षुण्ण बना रहे।इसी उद्देश्य सेअकबर ने महाराण प्रताप के पास समझौते के लिए चार बार दूत भेजे । सर्वप्रथम सितम्बर, सन् 1572 को अकबर ने वार्तालाप में निपुण अपने दरबारी जलाल खाँ कोर्ची को भेजा।उन्होंने महाराणा प्रताप को अकबर की शर्तों से सहमत कराने के भरसक प्रयास किये, किन्तु वह विफल रहा। उसके बाद अकबर ने विचार किया कि मुसलमान राजदूत के बजाय सहधर्मी और सजातीय राजपूत दूत भेजना अधिक उपयुक्त होगा। तत्पश्चात् अपै्रल, 1573 में अकबर ने आमेर के राजकंवर मानसिंह को भेजा,जो अकबर के रिश्तेदार भी थे।ये भी महाराणा प्रताप को अकबर के साथ समझौते के लिए राजी नहीं कर पाए। इसके बाद सितम्बर,सन् 1573 में अकबर ने आमेर के राजा और अपने सम्बन्धी भगवन्तदास को महाराणा प्रताप के पास समझौता करने के लिए भेजा।उनका महाराणा ने भरपूर सम्मान और सत्कार किया,पर उनके समझौते के प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। अन्त में दिसम्बर, 1573 को अकबर ने सबसे योग्य मंत्री, कुशल राजनीतिज्ञ, बुद्धिमान टोडरमल को दूत बनाकर भेजा, किन्तु महाराणा प्रताप ने हर बार की तरह उनकी प्रस्तावित सन्धि की शर्तों को ठुकरा दिया,क्योंकि उनमें मेवाड़ नरेश की दरबार में उपस्थिति/हाजिरी दर्ज कराना, कर चुकाना, मेवाड़ की स्त्रियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करना सम्मिलित था। 1अप्रैल, 1576 को महाराणा प्रताप पर आक्रमण करने के लिए मुगल सेना ने आगरा से प्रस्थान किया।
महाराणा प्रताप ने मुगल सेना से अपनी सुरक्षा और उसका सामना कने उद्देश्य से नई राजधानी चावण्ड बसायी। इसकी स्थापत्य कला सुदृढ़ता और सादगी पर ध्यान दिया। विशिष्ट और सामान्य जन के निवासों अधिक अन्तर नहीं था। चावड़ के आसपास के इलाके का विरान कर दिया,ताकि शत्रु सेना को जल तक न मिले । महाराणा प्रताप ने विशाल मुगल सेना का सामना करने को ‘छापामार युद्ध’(गोरिल्ला युद्ध) की रणनीति अपनायी, इसमें उनकी सेना की सीधे मुकाबला करने के बजाय छोटी-सी टुकड़ी अचानक कहीं भी मुगल सेना पर हमला कर उसकी रसद और हथियारों के भण्डार लूट कर पहाड़ियों में गायब हो जाती थी। इस रणनीति में वे किसी सीमा तक सफल रहे। महाराणा प्रताप के पिता राणा उदय सिंह पहले अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। प्रताप ने अपने पूर्वजों की परम्परा का निर्वहन करते हुए स्वतंत्रता का मार्ग चुना ।
वैसे तो महाराणा प्रताप ने अपने जीवन काल में कई युद्ध लड़े,लेकिन इनमें दो युद्ध मुख्य हैं। सन् 1576 में हल्दी घाटी का युद्ध हुआ। महाराणा प्रताप ने युद्ध के लिए हल्दी घाटी का चयन सुविचारित रणनीति के तहत किया था। हल्दी जैसे मिट्टी वाली यह घाटी अत्यन्त संकरी थी,जिसमें से अधिक संख्या में शत्रु सैनिकों का निकलना सम्भव नहीं था। फिर उसकी पहाड़ियों से शत्रुओं पर भील छुप कर तीर वर्षा कर सकते थे। इसमें विशाल मुगल सेना का नेतृत्व राजा मान सिंह तो महाराणा प्रताप की सेना की अगुवाई हकीम खाँ सूरी ने किया। महाराणा प्रताप की सेना मंे 22 हजार सैनिक थे। यह युद्ध अनिर्णीत रहा।उन्होंने महाराणा प्रताप की सेना अपने अद्भुत पराक्रम, शौर्य,बहादुरी से मुगल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दियां। इस युद्ध में चौदह हजार बहादुर राजपूत हल्दीघाटी के मैदान में वीरगति प्राप्त की,जिनमे 500से अधिक राजकुल के ही राजकुमार थेें। महाराणा प्रताप भी जंगल से निकल कर मुगल सेना पर टूट पड़े। जब वे इसके मध्य में पहुँचे, तब उनका सामना मुगल सेना के सेनापति राजा मानसिंह से हो गया,जो उस समय हाथी पर सवार थे। मह गए,किन्तु महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने हाथी के सिर पर पैर रख खड़ा हो गया,ऐसे में महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर भाले से प्रहार किया,पर मानसिंह ने झुक कर स्वयं को बचा लिया।लेकिन उस भाले के वार से उनका महावत मारा गया।इस दौरान मानसिंह के हाथी ने अपनी सूड़ में बँधी तलवार से चेतक के पिछले पाँव वार कर उसे घायल कर दिया।इस युद्ध में भील तीरन्दाजों ने अपने बाणों और गुलेल से फेंके पत्थरों से मुगल सेना बहुत क्षति पहुँचायी।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार -इस युद्ध में महाराणा प्रताप मानसिंह से युद्ध करना चाहते थे,किन्तु संयोग से उनका घोड़ा चेतक अकबर का बेटा शहजादा सलीम के हाथी के सामने आ गया, उन्होंने तत्काल रकाब पर पाँव रखकर भाला चलाया,जिससे महावत मकी मौत हो गई। जब उन्होंने दूसरा भाला चलाया,तब तक उसका हाथी भाग गया। इसके बाद मुगल सैनिक महाराणा पर चारों ओर से टूट पड़े। वे घायल हो गए। यह देखकर वीर राजपूत योद्धा मानसिंह झाला ने महाराणा प्रताप मुकुट अपने सिर पर रखकर उन्हें युद्ध से बाहर जाने का अनुरोध किया।
उनका दूसरा युद्ध सन् 1582 का ‘दिवेरयुद्ध’ था। इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध का ‘ मेवाड़ का मैराथन ’कहा है। इस विजय ने महाराणा प्रताप का खोया हुआ आत्म विश्वास तथा राज्य वापस दिलाया। शान्ति काल में महाराणा प्रताप ने जनहित की अनेक योजनाएँ चलायी और साहित्य,कला,चित्रकला आदि के उन्नयन में योगदान किया। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने चित्तौड़ के अलावा लगभग शेष मेवाड़ का इलाका मुगल शासक से स्वतंत्र करा लिया था।
19जनवरी, 1597 को चावण्ड में एकदुर्घटनामें घायल होने के बाद उनका निधन हो गया,पर वे इतिहास में अमर हो गए।
सम्पर्क-डॉक्टर बचन सिंह सिकरवार वरिष्ठ पत्रकार, 63ब,गाँधी नगर,आगरा-2820003 मोबाइल नम्बर-9411684054

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